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गुस्सैल बच्चे : 9 से 15 साल तक के बच्चे ज्यादा गुस्सैल और जिद्दी…..!!

जबलपुर – जरा-सी बात पर चीखते हुए नाराजगी जाहिर करना, घर में तोड़-फोड़ करना या फिर सुसाइड करने की धमकी देना। महज 9 से 15 साल के बच्चों की इन हरकतों से पैरेंट्स खासे परेशान हो रहे हैं। जिनका समाधान पाने के लिए वे मनोवैज्ञानिकों का सहारा लेते हैं। लेकिन इस बार से स्कूलों में ही बच्चों की काउंसलिंग की जाएगी। दरअसल, लगातार स्कूली बच्चों द्वारा उठाए जा रहे इन हिंसक कदमों को रोकने के लिए सीबीएसई ने हर स्कूल में मनोवैज्ञानिक नियुक्त करने के निर्देश जारी कर दिए हैं।

बोर्ड को मिली जानकारी के अनुसार गुस्सैल प्रवत्ति के बच्चे वे अधिक हो रहे हैं, जिनके पैरेंट्य वर्किंग हैं या फिर वे अपने बच्चों को अधिक समय नहीं दे पा रहे हैं। शहर के मनोवैज्ञानिक डॉ. रत्नेश कुररिया के अनुसार आजकल के बच्चे घर ही नहीं बाहर भी बेहद अग्रेसिव हो रहे हैं। ये पैरेंट्स और दूसरे फैमिली मेंबर्स के साथ बदतमीजी से बात करते हैं।

जिस चीज के लिए उन्हें मना किया जाता हैं, वे वही करते हैं। देर रात तक जागना, इंटरनेट और मोबाइल पर ज्यादा वक्त गुजारना और रोकने पर गुस्सा करना बेहद कॉमन हो गया है। बहुत से बच्चे जरा-जरा सी बात पर खुद को कमरे में बंदर कर लेते हैं। वे पैरेंट्स से बात करना बंद कर देते हैं।

पैरेंट्स करा रहे हैं काउंसलिंग

बच्चों के हिंसक व्यवहार से परेशान पैरेंट्स अब काउंसलर की मदद ले रहे हैं। जिन बच्चों के पैरेंट्स कामकाजी है, वे बच्चे ज्यादा एग्रेसिव हैं। पैरेंट्स उनके व्यवहार से ना सिर्फ परेशान हैं, बल्कि गिल्ट में आ रहे हैं। यही वजह है कि कुछ पैरेंट्स 5 से 7 सिटिंग लेने के बाद भी काउंसलिंग की मदद से ही बच्चों को हैंडल कर रहे हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. संजय सिंह का कहना है कि बच्चे अगर 15 साल की एज तक डिसीप्लीन में रहना सीख लेते हैं तो वे आगे चलकर बेहद अच्छा परफॉर्म करते है।

हम पैरेंट्स को यही समझाते हैं कि उन्हें डांटकर नहीं, बल्कि प्यार से समझाकर ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है। वर्किंग पैरेंट्स को इसके लिए ज्यादा मेहनत करनी होती है, क्योंकि उनके बच्चों में एग्रेशन ज्यादा है और वे समय नहीं दे पाने के गिल्ट में कई बार खुद ही बच्चे को बिगाड़ देते हैं। बच्चे के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताकर इस समस्या से बचा जा सकता है।

यही है परफेक्ट एज

बच्चे को अगर 9 से 15 साल की उम्र के बीच नहीं संभाला गया तो इसके बाद उनके सुधरने की गुंजाइश कम हो जाती है। क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर आप चाहते हैं कि बच्चों में अच्छी आदत है तो जरुरी है, पैरेंट्स भी उन आदतों को फॉलो करें। कोई भी रूल सिर्फ बच्चों के लिए न बनाएं। उसे खुद भी माने। क्वालिटी टाइम गुजारें और बच्चों की जासूसी न करें, बल्कि उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करें। ताकि वे अपनी हर बात बिना हिचकिचाए आपसे शेयर कर सकें

बच्चों के साथ ऐसे करें बिहेव

– बच्चे सोते समय या देर रात तक मोबाइल या नेट का यूज तो नहीं कर रहे हैं।

– उनके मन में रीडिंग हैबिट डेवलप करें।

– पैरेंट्स जितने भी थके या तनाव में हो, बच्चों पर अपना फ्रस्ट्रेशन ना निकालें।

– बच्चे की हर बात को ध्यान से सुनें और अगर वो जिद करें तो उदाहरण देकर समझाएं।

– दूसरी एक्टिविटी पर उसका ध्यान लगाएं और उसमें खुद भी दिलचस्पी लें।

– बच्चों को कंट्रोल करने के लिए टीवी से केवल कनेक्शन हटाने जैसी भूल न करें, एंटरटेनमेंट उनके लिए जरुरी है और बेवजह की सख्ती बात बिगाड़ सकती है।

– बच्चा जो भी सवाल पूछे उसका जवाब दें, डांटकर चुप न कराएं।

– रुटीन लाइफ का टाइमटेबल बनाएं और उसे बच्चे के साथ खुद भी फॉलों करें।

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