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पिछली बार मंत्री रहे कई नेताओं को इस बार पीएम मोदी ने क्यों मंत्रिमंडल में नहीं लिया ?

नई दिल्ली – 30 मई को राष्ट्रपति भवन में संपन्न हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शपथ-ग्रहण समारोह एक याद रह जाने वाली कहानी से कहीं ज्यादा है. उस वक्त मंच पर बैठे लोगों में से कौन क्या बनेगा इसका सभी को इंतजार था. और मंच पर सबसे ज्यादा जाने-पहचाने चेहरे थे बीजेपी के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू (भारत के उपराष्ट्रपति), लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और इस ग्रुप में नई-नई शामिल हुईं सुषमा स्वराज !

स्वराज का मंत्रिमंडल से बाहर जाना और अरुण जेटली का स्वास्थ्य कारणों से खुद का नाम वापस लेने ने कुछ लोगों की त्यौरियां चढ़ा दीं थी कि क्या यह वाकई दिवंगत वाजपेयी और उनके खास आडवाणी के युग का पूर्णत: अंत है. जिन दोनों नेताओं ने बीजेपी को दो सांसदों की पार्टी से एक मजबूत राजनीतिक मशीन बनाने की दिशा दी थी.

इस बात की पूरी संभावना है कि स्वराज को कुछ ही वक्त में कहीं गवर्नर बना दिया जाए या फिर जेटली को फिर से उनका स्वास्थ्य सही होने पर कोई मंत्रीपद दे दिया जाए. लेकिन उनमें से गायब चेहरों और शामिल नए चेहरों ने गुरुवार की उस गर्मी में कुछ और बातें सामने रखीं.

इस बार संकल्प पत्र के लक्ष्यों पर होगा पूरा जोर
मोदी ने उन्हें चुना है, जिनपर वे विश्वास करते हैं. वे अपने दूसरे कार्यकाल में काम पूरा करने के लिए उनकी क्षमताओं पर विश्वास करते हैं. खासकर उन क्षेत्रों में जहां अगले पांच सालों में उन्होंने जमकर काम करने के लिए सोच रखा है. इस बार अगर किसी ने अपेक्षा अनुसार प्रदर्शन करके नहीं दिखाया तो अपने पहले कार्यकाल की तरह पीएम मोदी इस बार धैर्य नहीं दिखाएंगे.

पीएम मोदी के 75 लक्ष्यों (जिनमें युवाओं से स्वास्थ्य और मूलभूत सुधारों से लेकर खेती तक शामिल हैं) को ’75 मील के पत्थरों’ के तौर पर बीजेपी के संकल्प-पत्र में शामिल किया गया था. ये नए मंत्रियों के लिए केवल दिशा देने वाले लक्ष्य नहीं होंगे बल्कि जरूरी कदम उठाने के लिए निश्चित योजनाएं हैं जो कि देश की चुनावी राजनीति का भविष्य तय करेंगीं !

23 मई को मिली जबरदस्त जीत के बाद मोदी ने दो बार से ज्यादा अपने इन ‘मील के पत्थरों’ का जनता को संबोधित करने के दौरान जिक्र किया.

पीएम मोदी ने मंत्रिमंडल चुनने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई
इसलिए एक मंत्रिमंडल जिसमें पीएम मोदी भरोसा करते हों वह उनके दूसरे कार्यकाल में नतीजे लाकर दिखाएगा और इसके अलावा लक्ष्यों की तरह ही उसके भी प्रदर्शन की समीक्षा की जा सकेगी. इस बार अपनी टीम चुनने के लिए पीएम मोदी ने 2014 के मुकाबले बहुत कम वक्त खर्च किया है.

पिछली बार पीएम मोदी दिल्ली के सत्ता के गलियारों के लिए नए थे और उन्हें अपनी टीम चुनने से पहले कई लोगों से बातचीत करनी पड़ी थी. जिनसे पीएम ने बात की थी, उनमें पार्टी के सीनियर नेताओं और पार्टी के वैचारिक मेंटर संघ के लोगों के साथ ही कई सारे लोग शामिल थे. पहले की तरह 2019 में संघ का रोल इस चयन में उतना प्रभावी नहीं रहा है.

मंत्रियों को चुनना पीएम मोदी का विशेषाधिकार मानते हुए साधारण आरक्षण, पार्टी की परंपराएं और भीतर की स्थितियों को इस मामले में ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है. यही वजह है कि अमित शाह को दिया गया यह बड़ा पद किसी तरह के आश्चर्य की तरह नहीं लगता है.

कुछ बेहतरीन कदम उठाए गए
जहां तक राजनाथ सिंह की बात है, वे अपनी वरिष्ठता के चलते अभी भी पार्टी में नंबर दो पर बने रह सकते हैं. वे पीएम मोदी के बाद शपथ लेने के मामले में भी दूसरे नंबर पर थे, उनके बाद अमित शाह ने शपथ ली थी.

पीएम मोदी के सबसे प्रमुख निर्णयों में निर्मला सीतारमन को देश की पहली वित्तमंत्री बनाना रहा है. ऐसा जेटली के खाली स्थान को भरने के लिए किया गया.

इसके अलावा सुषमा स्वराज की जगह पर विदेश मंत्री के तौर पर एस जयशंकर को लेकर आना, अमेरिका और चीन के आक्रामक तरीकों से चतुराई से निपटने की योजना के साथ जाने वाली बात है.

कुछ को एहतियातन रोका गया
स्वराज ने पहले ही लोकसभा चुनाव न लड़ने की बात कह दी थी. जिसके बाद पार्टी का नेतृत्व उनसे इस बात पर कुछ रूठा हुआ था कि उन्होंने पार्टी के अंदर यह बात बताने से पहले ही इसकी सार्वजनिक घोषणा कर दी शायद यह बात भी उनके पक्ष में नहीं गई. ऐसा ही कुछ उमा भारती के साथ भी रहा.

कभी मोदी के चहेते रहे सुरेश प्रभु को नई कैबिनेट में जगह न मिलना आश्चर्य की बात है. 2014 में, प्रभु को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने ने उनकी पार्टी शिवसेना में संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी थी, जिसके बाद प्रभु ने शिवसेना से इस्तीफा दे दिया था और बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा का एमपी बना दिया था. अब चूंकि कुछ ही महीनों में महाराष्ट्र में चुनाव हैं तो पीएम फिर से शिवसेना से बैर मोल लेना नहीं चाहते हैं इसके अलावा सुरेश प्रभु का स्वास्थ्य भी इस फैसले में एक कारण बना होगा.

कुछ नेताओं को ले डूबे विवाद
इनके अलावा लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान विवाद खड़ा करने वाली मेनका गांधी को भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है. जाहिर है पीएम उनके मुस्लिमों को लेकर दिए बयान के विरोध में हैं. यही कारण रहा कि पीएम मोदी ने जीतने के बाद अपने पहले ही जनसंदेश में यह साफ किया कि वे जीतने के बाद सभी के लिए काम करेंगे !

जयंत सिन्हा ने पिछली सरकार ने राज्य मंत्री के तौर पर बेहतर काम किया था, उन्होंने वित्त और नागरिक उड्डयन दोनों ही मंत्रालयों का काम अच्छे से देखा था. लेकिन यशवंत सिन्हा का बेटा होने के नाते उनके विकल्प सीमित हो गए. यशवंत लगातार मोदी की आलोचना करते रहे हैं. साथ ही जयंत सिन्हा ने झारखंड में हत्या के दोषियों का माला पहना स्वागत किया, यह बात भी पीएम को पसंद नहीं आई होगी.

कई लोगों की जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं
राज्यवर्धन सिंह राठौर ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री के तौर पर अच्छा काम किया था और वे पिछली सरकार के युवा चेहरों में प्रमुख थे. उनके पास युवा और खेल जैसा प्रमुख मंत्रालय भी था. प्रधानमंत्री के विजनरी प्रोग्राम खेलो इंडिया को भी उन्होंने अच्छे से आगे बढ़ाया था. कहा जा रहा है कि राजस्थान में बीजेपी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन्हें दी जा सकती है. यह निर्णय यही दिखाता है. इसके अलावा खेती के क्षेत्र में खास प्रदर्शन न कर पाने का नुकसान राधामोहन सिंह को उठाना पड़ा है.

कहा जा रहा है कि जेपी नड्डा को मंत्रिमंडल में शामिल न किए जाने के पीछे यह कारण है कि अमित शाह के केंद्रीय गृह मंत्री बनने के बाद उन्हें बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है !

इसके अलावा मोदी के प्रिय मंत्री मनोज सिन्हा यूपी में लोकसभा चुनावों को देखते हुए मंत्रिमंडल से बाहर रहे हैं. कुल मिलाकर लोगों के जीवन में सुधारों के लिए और अच्छे चुनाव परिणामों के लिए मोदी के नेतृत्व में 2019 के चुनावों में पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है !

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